Monday, June 1, 2026

सज्जन कुमार के खिलाफ नहीं था कोई सबूत, फैसले के लिए कोर्ट का धन्यवाद: अधिवक्ता अनिल कुमार शर्मा

तिरहुत डेस्क (नई दिल्ली)। दिल्ली कोर्ट ने 1984 के सिख विरोधी दंगों के दौरान राजधानी में जनकपुरी और विकासपुरी इलाकों में हिंसा भड़काने से जुड़े एक मामले में पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार को बरी कर दिया है।

पूर्व सांसद सज्जन कुमार के वकील अनिल कुमार शर्मा ने मीडिया से बात करते हुए कहा, “कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया है क्योंकि विकासपुरी और जनकपुरी मामलों में उनके खिलाफ कोई भी आरोप साबित नहीं हो सका। इन गवाहों में से किसी ने भी 38 साल पहले सज्जन कुमार का नाम नहीं लिया था, एक बार भी नहीं। कोई नया सबूत नहीं है, कोई नया बयान नहीं है, कोई नई कहानी नहीं है। वे उन्हें निशाना बनाने की अपनी कोशिश में नाकाम रहे। हम उन्हें बरी करने के लिए न्यायपालिका का धन्यवाद करते हैं।”

उन्होंने कहा कि सज्जन कुमार के ऊपर दो दिनों में दो मामले दर्ज किए गए थे। इनके ऊपर 302 का केस पहले ही नहीं बना था। हमारा प्रयास सच सामने लाना था। इन्होंने जितने भी गवाह लाए थे, उन सबकी गवाही हो चुकी थी, जिसके चलते इनके पास कोई सही साक्ष्य नहीं था और कोर्ट ने पूर्व सांसद सज्जन कुमार को बरी कर दिया।

राऊज एवेन्यू कोर्ट के स्पेशल जज दिग्विजय सिंह ने एक आदेश सुनाते हुए 78 साल के सज्जन कुमार को बरी कर दिया। यह मामला 31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके सिख बॉडीगार्ड्स द्वारा हत्या के बाद भड़के दंगों के दौरान हुई हिंसा के आरोपों से जुड़ा था।

दशकों बाद जस्टिस जीपी माथुर कमेटी की सिफारिश पर 114 मामलों को फिर से खोलने के लिए एसआईटी बनाई गई थी।

अगस्त 2023 में ट्रायल कोर्ट ने औपचारिक रूप से सज्जन कुमार के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की अलग-अलग धाराओं के तहत आरोप तय किए, लेकिन एसआईटी की ओर से पहले लगाई गई धारा 302 के तहत हत्या का आरोप हटाने का फैसला किया।

इस मामले में ट्रायल पिछले साल 23 सितंबर को खत्म हो गया था, जिसके बाद कोर्ट ने 22 दिसंबर को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

9 नवंबर, 2023 को कोर्ट ने पीड़ित मनजीत कौर का बयान दर्ज किया था, जिन्होंने कहा था कि उन्होंने भीड़ के सदस्यों से सुना था कि हिंसा के दौरान सज्जन कुमार मौजूद थे, लेकिन यह भी साफ किया कि उन्होंने उन्हें मौके पर खुद नहीं देखा था।

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक दूसरे मामले में उनके खिलाफ कड़ी टिप्पणी करते हुए फैसला सुनाया था, जिसमें कहा गया था कि उन्होंने ‘राजनीतिक संरक्षण’ के कारण दशकों तक न्याय से बचने की कोशिश की और उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई थी। उस सजा के खिलाफ उनकी अपील सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

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