Saturday, February 24, 2024

आनंद मोहन की रिहाई में दया दिखाने से नितीश कुमार का फायदा या नुकसान?

(अब्दुल मोबीन) राजपुत बिरादरी के बाहुबली नेता, दो बार के विधायक और एक बार शिवहर से सांसद रहे अपने दौर के दबंग नेता आनंद मोहन 15 वर्ष 9 महीने की सजा काटने के बाद आखिर कार नीतीश सरकार की सियासी दया के कारण आज जेल से बाहर आ गए हैं। आनन्द मोहन की रिहाई को लेकर विपक्ष, युपी की पूर्व मुख्यमंत्री और दलित नेत्री मायावती, मीम के फायर ब्राण्ड नेता असदुद्दीन ओवैसी सहित अन्य नेताओं ने नितिश सरकार पर निशाना साधा है और नितीश को दलित विरोधी करार दिया है। क्योंकि आनन्द मोहन जिस डीएम की मृत्यू की सजा काट रहे थे वह डीएम कृष्णैया भी दलित ही थे।
विदित हो कि 4 दिसम्बर 1994 रविवार को मुजफ्फरपुर के बाहुबली छोटन शुक्ला की हत्या हुई थी जिसके विराध में शुक्ला के समर्थकों ने 5 दिसम्बर 1994 को मुजफ्फरपुर- पटना हाईवे को जाम किया हुआ था और गोलपालगंज के तत्कालीन डीएम कृष्णैया हाजीपुर से गोपालगंज के लिए जा रहे थे कि मुजफ्फरपुर जीरोमाइल चौक पर बेकाबु भीड़ ने कृष्णैया को बुरी तरह पीटा जिससे अस्पताल पहुंचने से पूर्व ही गोपालगंज के तत्कालीन डीएम की मृत्यू हो गई। और पूलिस ने भीड़ को भड़काने को लेकर डीएम की मौत का जिम्मेदार ठहराते हुए उस समय के उभरते हुए बाहुबली नेता आनन्द मोहन को गिरफतार किया, और इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि किसी सांसद को अदालत ने फांसी की सजा सुनाई, लेकिन निचली अदालत की फांसी की सजा को पटना हाई कोर्ट ने आजीवन कारावास में बदला, और फिर इस तरह आनन्द मोहन तब से अब तक जेल की सजा काट रहे थे। क्यिोंकि आनन्द मोहन की सजा में यह स्पष्ट लिखा था कि काम पर तैनात सरकारी सेवक की हत्या की जिम्मेदारी इनके सर है। और यह अंश जेल मैनुयल में दर्ज था लेकिन नितीश सरकार ने (काम पर तैनात सरकारी सेवक की हत्या) अंश को हटाते हुए आनन्द मोहन के साथ इस केस में सजा काट रहे या इस केस के दोषी लवली आनन्द, भुटकुन शुक्ला, और मुन्ना शुक्ला को बरी करा दिया है। यानी अब कृष्णैया डीएम का मुकद्दमा ही समाप्त हो गया है।
इस रिहाई को लेकर यह बात साफ है कि नितीश कुमार बिहार के राजपुत वोटरों को अपने पाले में करना चाहते हैं। और शिवहर सीट आनंद मोहन के कुंबे को सौंपना चाहते हैं। क्योंकि इस सीट के बारे में आम धारना है कि राजपुत प्रत्याशी का इस सीट पर हमेशा से दबदबा रहा है।
लेकिन नितीश कुमार की इस सोच से दलित वोटरों में नाराजगी पाई जा रही है। अब यह नाराजगी नितीश के लिए कितनी मायने रखती है यह तो वही जानते हैं।
आनंद मोहन की रिहाई को लेकर डीएम कृष्णैया की पत्नि और बेटी ने भी नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि सरकार के इस कदम से लोकसेवकों का मनोबल टुटेगा और अपराधीयों के हौसले बुलन्द होंगे। उनका कहना है कि इस मामले को लेकर वह राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप की गुहार लगाएंगी।
वहीं दूसरी तरफ कई राज्यों के आईएएस समुहों ने भी नितीश के जेल मैनुयल संसोधन की आलोचना की है।
इन सारी आलोचनाओं ओर नाराजगीयों को लेकर नितीश सरकार कुछ तनाव में है शायद इसी लिए वरिष्ठ आईएएस अधिकारी आमीर सुबहानी इस मामले को लेकर सफाई देते नजर आ रहे हैं। उनका कहना है कि आनंद मोहन की सजा की अवधी पुरी हो गई थी इसलिए उन्हें रिहा किया गया है। न कि उनपर कोई दया की गई है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि जब जेल मैनुयल में अंकित ( काम पर तैनात सरकारी सेवक की हत्या) अंश को हटाना ही सरकार की दया का दर्शाता है।
अब दया चाहे जिसकी हो आनन्द मोहन जेल से रिहा हो गए हैं। और देखना है कि इस बार शिवहर लोकसभा में महा गठबंधन उन्हें अपनी कमान सौंपती है या नहीं। यदि ऐसा हुआ तो नितीश या राजद अपने दावपेच में कितने कामयाब होते हैं यह तो आनेवाला समय ही बताएगा।

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